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महावीर जयंती ...

महावीर जयंती

महावीर जयंती (महावीर स्वामी जन्म कल्याणक) चैत्र शुक्ल १३ को मनाया जाता है। यह पर्व जैन धर्म के २४वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के उपलक्ष में मनाया जाता है। यह जैनों का सबसे प्रमुख पर्व है। मानव समाज को अन्धकार से प्रकाश की ओर लाने वाले महापुरुष भगवान महावीर का जन्म ईसा से 599 वर्ष पूर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशिला देवी के यहां हुआ था। जिस कारण इस दिन जैन श्रद्धालु इस पावन दिवस को महावीर जयन्ती के रूप में परंपरागत तरीके से हर्षोल्लास और श्रद्धाभक्ति पूर्वक मनाते हैं। साल 2018 में महावीर जयंती 29 मार्च को मनाई जाएगी।

भगवान महावीर का जीवन परिचय 

भगवान महावीर स्वामी का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व कुंडग्राम (बिहार), भारत मे हुआ था। महावीर जयंती पर्व जैन समुदाय के लिए सबसे बड़ा त्योहार है क्योंकि आज ही जैन धर्म की स्थापना करने वाले भगवान महावीर का जन्म हुआ था. इस पर्व को महावीर जन्म कल्यानक भी कहा जाता है.

इस पर्व पर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर वर्धमान महावीर की जयंती मनाई जाती है. ये त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष के तेरहवें दिन मनाया जाता है. 30 वर्ष तक महावीर जी ने त्याग, प्रेम व् अहिंसा का संदेश फैलाया और बाद में वे जैन धर्म के 24वें तीर्थकर बने | यह विश्व के श्रेष्ठ महात्माओं में गिने जाते हैं | 

भारत में गुजरात, महाराष्ट्र, कलकत्ता बिहार, और राजस्थान में यह त्योहार मनाया जाता है | 72 वर्ष की आयु में यह जैन धर्म के तीर्थकारों में एक बन गये और तभी से इन्हें जैन धर्म का संस्थापक भी कहा जाने लगा | इस अवसर पर जैन धर्म के अनुयायी विशेषरूप से अपने मंदिरों की सजावट करते है तथा सड़कों पर रैली भी निकालते हैं | जो लोग जैन धर्म के सिद्धांतों को अनेक लोगो तक पहुँचाना चाहते हैं वो लोग इस दिन मंदिरों में प्रवचन भी देते हैं | इस अवसर पर कई राज्यों के शराब व् मांस की दुकाने बंद रहती हैं | इस त्योहार को महावीर स्वामी जन कल्याणक तथा वर्धमान जयंती के नाम से भी जानते हैं |

राजा के यहां पैदा हुआ संत

भगवान महावीर का जन्म वैशाली के राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहां हुआ था. उनका नाम वर्धमान रखा गया था. उनका संबंध इक्ष्वांकु वंश में हुआ था. वर्धमान ने अपने पिता के बाद 30 सालों तक शासन किया लेकिन बाद में उन्होंने सारे मोह-माया का त्याग कर दिया और जीवन के सत्य की खोज में निकल गए. उन्होंने 12 सालों तक कठिन तपस्या की. वैशाख शुक्ल दशमी को ऋजुबालुका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. उन्होंने इसके बाद जैन धर्म को फिर से प्रतिष्ठित किया, इसीलिए उन्हें जैन धर्म के दर्शन और प्रचार-प्रसार का श्रेय दिया जाता है.

अपने पूरे जीवन में उन्होंने अपने शिष्यों को पांच व्रत सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह की शिक्षा दी. उनकी शिक्षा को जैन अगम कहा गया. उनके सबसे बड़े व्रत सत्य का ही अनुपालन करता जैन विद्वानों का उपदेश है- 'अहिंसा ही परमधर्म है. अहिंसा ही परम ब्रह्म है. अहिंसा ही सुख-शांति देने वाली है. अहिंसा ही संसार का उद्धार करने वाली है. यही मानव का सच्चा धर्म है. यही मानव का सच्चा कर्म है.'

जैन धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान महावीर को 72 साल की आयु में कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली के दिन पावापुरी में मोक्ष प्राप्त हुआ.
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