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चातुर्मास पर्व ...

चातुर्मास पर्व

चातुर्मास पर्व यानि चार महीने का पर्व जैन धर्म का एक अहम पर्व होता है। इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर साधना और पूजा पाठ किया जाता है। वर्षा ऋतु के चार महीने में चातुर्मास पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2018 में जैन चातुर्मास पर्व 26 जुलाई से शुरू होंगे जो आने वाले चार महीने तक चलेंगे।

क्यों मनाया जाता है चातुर्मास पर्व? 

जैन धर्म पूर्णतः अहिंसा पर आधारित है। जैन धर्म में जीवों के प्रति शून्य हिंसा पर जोर दिया जाता है। जैन धर्म के अनुसार बारिश के मौसम में कई प्रकार के कीड़े, सूक्ष्म जीव जो आंखों से दिखाई नहीं देते वह सर्वाधिक सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे में मनुष्य के अधिक चलने-उठने के कारण इन जीवों को नुकसान पहुंच सकता है।

अतः इन जीवों को परेशानी ना हो और जैन साधुओं के कम से कम हिंसा हो इसलिए चातुर्मास में चार महीने एक ही जगह रहकर धर्म कल्याण के कार्य किए जाते हैं। इस दौरान जैन साधु किसी एक जगह ठहरकर तप, प्रवचन तथा जिनवाणी के प्रचार-प्रसार को महत्त्व देते हैं।

चातुर्मास पर्व का महत्व 

हिंदू धर्म की तरह ही जैन धर्म में भी चातुर्मास का महत्व है। इस दौरान जैन धर्म के अनुयायी ज्ञान, दर्शन, चरित्र व तप की आराधना करते हैं। चातुर्मास जैन मुनियों के लिए शास्त्रों में नवकोटि विहार का संकेत है। जैन धर्म के अनुयायी वर्ष भर पैदल चलकर भक्तों के बीच अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य का विशेष ज्ञान बांटते हैं। चातुर्मास में ही जैन धर्म का सबसे प्रमुख पर्व पर्युषण पर्व मनाया जाता है। 

भगवान महावीर ने चातुर्मास को 'विहार चरिया इसिणां पसत्था' कहकर विहारचर्या को प्रशस्त बताया है। भगवान बुद्ध चातुर्मास के बारे में कहते हैं 'चरथ भिक्खवे चारिकां बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' । ऐसा कहकर बौद्ध भिक्षुओं के लिए 'चरैवेति-चरैवेति' का संदेश दिया है। जैन मुनि चातुर्मास में तो चार महीने एक स्थान में रहते हैं पर शेष आठ महीने एक-एक महीने कर कम से कम आठ स्थानों में प्रवास कर सकते हैं। कल्पसूत्र आदि अनेक सूत्रों में जैन-मुनियों की विहारचर्या की विशद चर्चा की गई है पर चातुर्मास काल में ‘वासासु परिसंवुडा’ के अनुसार वर्षाकाल में अपने आप को परिसंवृत होकर रहना पड़ता है। अर्थात् इस काल में वे ज्यादा घूमना-फिरना नहीं कर सकते।

मान्यता है जो जैन अनुयायी वर्ष भर जैन धर्म की विशेष मान्यताओं का पालन नहीं कर पाते वह इन 8 दिनों के पर्युषण पर्व में रात्रि भोजन का त्याग, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, जप -तप मांगलिक प्रवचनों का लाभ तथा साधु-संतों की सेवा में संलिप्त रह कर जीवन सफल करने की मंगलकामना कर सकते हैं। साथ ही चार महीने तक एक ही स्थान पर रहकर ध्यान लगाने, प्रवचन देने आदि से कई युवाओं का मार्गदर्शन होता है। चातुर्मास खुद को समझने और अन्य प्राणियों को अभयदान देने का अवसर माना जाता है।
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