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ईद-उल-अजहा यानी बकरीद ...

ईद-उल-अजहा यानी बकरीद

खुशियों का त्योहार ईद-उल-अजहा यानी बकरीद 22 अगस्त को मनाई जाएगी। इसे लेकर बाजारों में काफी चहल पहल रहती है। ईद के मौके पर हर कोई अल्लाह को अपनी ओर से कुर्बानी देना चाहता है। लेकिन कुर्बानी देने से पहले कुछ नियम होते हैं, जिनका पालन करना हर किसी के लिए जरूरी होता है। आइए जानते हैं उन नियमों के बारे में…

  • बकरीद पर कुर्बानी का मतलब यहां ऐसे बलिदान से हैं जो दूसरों के लिए दिया गया हो। बकरे या फिर अन्य जानवर की कुर्बानी केवल एक प्रतिकात्मक कुर्बानी दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, अल्लाह के पास ह‌ड्ड‌ियां, मांस और खून नहीं पहुंचता है। उनके पास केवल खुशु पहुंचती है यानी देने का जज्‍बा। आप समाज की भलाई के लिए क्या दे सकते हैं।
  • कुर्बानी का पहला नियम यह है कि जिसके पास 613 से 614 ग्राम चांदी हो यानी आज के हिसाब से इतनी चांदी की कीमत के बराबर धन हो। केवल उन्ही लोगों को कुर्बानी का फर्ज है यानी उसे कुर्बानी देनी चाहिए।
  • जिस किसी व्यक्ति के पास पहले से कर्ज है तो वह कुर्बानी नहीं दे सकता। कुर्बानी देने वाले के ऊपर उस समय कोई कर्ज नहीं होना चाहिए।
  • जो व्यक्ति अपनी कमाई का ढ़ाई फीसदी दान देता है। साथ ही समाज की भलाई के लिए धन के साथ हमेशा आगे रहता है। उसके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है।
  • शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो या छोटे पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती।
  • ईद की नमाज के बाद मांस के तीन हिस्से होते हैं। एक खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए। वैसे ज्यादातर लोग सभी हिस्सों का गरीबों में बांट देते हैं।

इस्लाम में दो तरह की ईद मनाई जाती है। पहली जो एक महीने तक चलने वाले रमजान के रोजे के बाद मनाई जाती है और दूसरी जो एक महीने के अंतराल के पश्चात हज के महीने में मनाई जाते हैं। पहली ईद को भारतीय संदर्भ में मीठी ईद और दूसरी को कुर्बानी की ईद कहते हैं। इसे ईद-उल-अजहा भी कहते हैं। बकरीद हजरत इब्राहीम नाम के ईश दूत और उनके बेटे हजरत इस्माइल की उस घटना की यादगार है, जिसमें इब्राहिम सपने में निरंतर ये देख रहे थे कि वह अपने बेटे को अल्लाह के नाम पर कुर्बान कर रहे हैं या फिर कहें कि उनकी बलि दे रहे हैं। 

अल्लाह ने लिया था इब्राहीम का इम्तिहान

हजरत इब्राहीम ने जब यह बात अपने बेटे को बताया तो वे अपनी जान देने के लिए तुरंत राजी हो गए और उन्होंने कहा कि यदि हमारे ईश्वर ऐसा चाहते हैं तो हमें इसमें कोई संकोच नहीं करना चाहिए। वहीं ईश्वर को उनकी जान नहीं चाहिए थी, बल्कि वह तो इब्राहीम की अपने प्रति निष्ठा और आस्था को परखना चाहते थे, जिसमें वह पूरे खरे उतरे। जब पिता इब्राहीम बेटे को कुर्बान करने को जा रहे थे तो रास्ते में शैतान ने उनको भटकाने की कोशिश की। शैतान ने पहले पिता इब्राहीम से कहा कि ये जवान बेटा है, तुम्हारे बुढ़ापे की लाठी है, इसको कुर्बान कर दोगे तो तुम्हारी देख-रेख कौन करेगा?

कायम रहा ईमान, न भटका सका शैतान

हजरत इब्राहीम ने जब शैतान को दुत्कार दिया तो उसने उनके बेटे हजरत इस्माइल को बरगलाना चाहा? लेकिन बेटे ने भी उसको दुत्कार दिया। जब बाप- बेटे को कुर्बान करने के लिए तैयार हुए तब बेटे ने बाप से कहा अपनी आंखों पर पट्टी बांध लीजिए। कहीं ऐसा न हो कि पुत्र प्रेम में आपके हाथ डगमगा जाए। और ऐसा ही हुआ और उन्होंने पट्टी बांध लिया। 

तब अल्लाह ने बचाई बेटे की जान

हजरत इब्राहीम ने जब बेटे को लिटाकर छूरी फेरना चाह तो उसी समय ईश्वर ने एक जानवर भेज दिया और उनके बेटे इस्माइल की जान बचा ली। उसी की याद आज सारी दुनिया में मुसलमान जो आर्थिक रूप से सक्षम और संपन्न हैं, वो कुर्बानी करते हैं और इब्राहीम और इस्माइल का अनुसरण करते हैं। हजरत इब्राहीम वो दिव्य दूत हैं जिन पर यहूदी, ईसाई और मुसलमान समान रूप से आस्था रखते हैं। 
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