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पितृ पक्ष ...

पितृ पक्ष

पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्‍मा की शांति के लिए श्राद्ध किया जाता है.  मान्‍यता है कि अगर पितर नाराज हो जाएं तो व्‍यक्ति का जीवन भी खुशहाल नहीं रहता और उसे कई तरह की समस्‍याओं का सामना करना पड़ता है. यही नहीं घर में अशांति फैलती है और व्‍यापार व गृहस्‍थी में भी हानि झेलनी पड़ती है. ऐसे में पितरों को तृप्‍त करना और उनकी आत्‍मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध करना जरूरी माना जाता है. श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है और पिंड दान व तर्पण कर उनकी आत्‍मा की शांति की कामना की जाती है.

पितृ पक्ष का महत्‍व 

हिन्‍दू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्‍व है. हिन्‍दू धर्म को मानने वाले लोगों में मृत्‍यु के बाद मृत व्‍यक्ति का श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है. मान्‍यता है कि अगर श्राद्ध न किया जाए तो मरने वाले व्‍यक्ति की आत्‍मा को मुक्ति नहीं मिलती है. वहीं कहा जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करने से वे प्रसन्‍न होते हैं और उनकी आत्‍मा को शांति मिलती है. मान्‍यता है कि पितृ पक्ष में यमराज पितरों को अपने परिजनों से मिलने के लिए मुक्‍त कर देते हैं. इस दौरान अगर पितरों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्‍मा दुखी हो जाती है. 

कब है पितृ पक्ष?

हिन्‍दू कैलेंडर के मुताबिक पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं. इसकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है, जबकि समाप्ति अमावस्या पर होती है. अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है. आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है, लेकिन इस साल तिथि के घटने से ये एक दिन कम हो गए हैं. इस बार पितृ पक्ष 15 दिनों के होंगे. इस बार पितृ पक्ष 24 सितंबर से शुरू होकर 8 अक्टूबर को खत्म होंगे.

श्राद्ध की तिथियां
पितृ पक्ष के पूरे 16 दिनों के दौरान श्राद्ध की इन तिथियों के मुताबिक श्राद्ध देंगे. तिथियों की तरह ही श्राद्ध मनाने का सही समय और विधि होती है. इसी के साथ पितरों को श्राद्ध देने के कुछ खास नियम भी होते हैं. हिंदु मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध मनाने का अर्थ है साल में एक बाद अपने पितरों को याद कर उन्हें भरपेट भोजन कराना और उनकी आत्माओं को खुश करना. इस प्रक्रिया में की गई छोटी-सी गलती भी पितरों को नाराज़ कर सकती है. 
*24 सितंबर- पूर्णिमा श्राद्ध , *25 सितंबर- प्रतिपदा, *26 सितंबर-  द्वितीया, *27 सितंबर- तृतीया, *28 सितंबर- चतुर्थी, *29 सितंबर- पंचमी, महा भरणी, *30 सितंबर- षष्ठी, *1 अक्टूबर - सप्तमी, *2 अक्टूबर - अष्टमी, *3 अक्टूबर- नवमी, *4 अक्टूबर- दशमी, *5 अक्टूबर - एकादशी, *6 अक्टूबर - द्वादशी, *7 अक्टूबर - त्रयोदशी, चतुर्दशी, मघा श्राद्ध, *8 अक्टूबर - सर्वपित्र अमावस्या.

पितृ पक्ष में किस दिन करें श्राद्ध?

दिवंगत परिजन की मृत्‍यु की तिथि में ही श्राद्ध किया जाता है. यानी कि अगर परिजन की मृत्‍यु प्रतिपदा के दिन हुई है तो प्रतिपदा के दिन ही श्राद्ध करना चाहिए. आमतौर पर पितृ पक्ष में इस तरह श्राद्ध की तिथ‍ि का चयन किया जाता है: 
  • जिन परिजनों की अकाल मृत्‍यु या किसी दुर्घटना या आत्‍महत्‍या का मामला हो तो श्राद्ध चतुर्दशी के दिन किया जाता है. 
  • दिवंगत पिता का श्राद्ध अष्‍टमी के दिन और मां का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है. 
  • जिन पितरों के मरने की तिथि याद न हो या पता न हो तो अमावस्‍या के दिन श्राद्ध करना चाहिए. 
  • अगर कोई महिल सुहागिन मृत्‍यु को प्राप्‍त हुई हो तो उसका श्राद्ध नवमी को करना चाहिए. 
  • संन्‍यासी का श्राद्ध द्वादशी को किया जाता है. 

श्राद्ध के 7 नियम (7 Rules of Shradh)

  1. पितृपक्ष में हर दिन तर्पण करना चाहिए. पानी में दूध, जौ, चावल और गंगाजल डालकर तर्पण किया जाता है.
  2. इस दौरान पिंड दान करना चाहिए. श्राद्ध कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलकर पिंड बनाए जाते हैं. पिंड को शरीर का प्रतीक माना जाता है. 
  3. इस दौरान कोई भी शुभ कार्य, विशेष पूजा-पाठ और अनुष्‍ठान नहीं करना चाहिए. हालांकि देवताओं की नित्‍य पूजा को बंद नहीं करना चाहिए. 
  4. श्राद्ध के दौरान पान खाने, तेल लगाने और संभोग की मनाही है. 
  5. इस दौरान रंगीन फूलों का इस्‍तेमाल भी वर्जित है.
  6. पितृ पक्ष में चना, मसूर, बैंगन, हींग, शलजम, मांस, लहसुन, प्‍याज और काला नमक भी नहीं खाया जाता है.
  7. इस दौरान कई लोग नए वस्‍त्र, नया भवन, गहने या अन्‍य कीमती सामान नहीं खरीदते हैं. 
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